रमा एकादशी 2026
बुधवार, 4 नवंबर 2026 · कृष्ण पक्ष, एकादशी तिथि — दीपावली से पूर्व समृद्धि का व्रत.
व्रत एवं पारण का समय
एकादशी तिथि भर व्रत रखा जाता है और अगली सुबह द्वादशी पर पारण समय-सीमा में तोड़ा जाता है। नीचे दिए समय नई दिल्ली के लिए हैं और अनुमानित हैं — अपने शहर के लिए पंचांग से सटीक तिथि और पारण की पुष्टि करें।

रमा एकादशी
बुधवार, 4 नवंबर 2026
समय नई दिल्ली के लिए हैं और आपके स्थान के अनुसार बदलते हैं। आज का पंचांग देखें अपने शहर के लिए।
व्रत कैसे रखें
प्रातःकालीन संकल्प से लेकर द्वादशी पर पारण तक — चार सरल चरण।
ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और शुद्ध एवं स्थिर मन से व्रत का संकल्प लें।
तुलसी, पुष्प, धूप और घी के दीपक से भगवान विष्णु की पूजा करें; फल और पंचामृत अर्पित करें।
अन्न और दालों का त्याग करें। दिन भर जप, कथा और दान में लगे रहें और रात्रि जागरण करें।
द्वादशी की प्रातःकाल में निर्धारित समय-सीमा के भीतर, दीन-दुखियों को भोजन कराने के बाद व्रत तोड़ें।
व्रत तभी पूर्ण होता है जब इसे सही ढंग से तोड़ा जाए: द्वादशी तिथि पर, पारण समय-सीमा में और एकादशी समाप्त होने के बाद। 2026 में रमा एकादशी का पारण बुधवार, 4 नवंबर 2026 की अगली सुबह, नई दिल्ली में पड़ता है।
रमा एकादशी को हिंदू कैलेंडर की महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना जाता है। यह कार्तिक महीने के कृ्ष्ण पक्ष में पड़ती है, जिसका विशेष धार्मिक महत्व है। यह एकादशी आध्यात्मिक मुक्ति, पिछले जन्म के बुरे कर्मों का नाश और सफल जीवन के लिए लक्ष्मी नारायण की पूजा के लिए समर्पित दिन है। अगर आप रमा एकादशी व्रत से जुड़ी संपूर्ण व्रत नियम, शुभ मुहूर्त, महत्व, कथा और पूजा विधि के बारे में जानना चाहते हैं तो पूरा पृष्ठ जरूर पढ़ें।
रमा एकादशी 2026: तिथि और मुहूर्त
अगर आप जानना चाहते हैं कि रमा एकादशी 2026 में किस दिन पड़ रही है और इसका क्या शुभ मुहूर्त रहेगा और नीचे तालिका में संपूर्ण जानकारी दी गई है।
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पर्व की जानकारी |
तिथि और मुहूर्त |
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रमा एकादशी |
गुरुवार, 5 नवंबर 2026 |
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कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि प्रारंभ |
4 नवंबर, सुबह 11:03 बजे |
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कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि समाप्त |
5 नवंबर, सुबह 10:35 बजे |
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रमा एकादशी पारण |
शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 |
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पारण का मुहूर्त |
6 नवंबर सुबह 6:37 बजे से 10:15 बजे तक |
नोट: इस बात का ध्यान रखें कि ऊपर तालिका में बताया गया मुहूर्त नई दिल्ली के समय के अनुसार है। सटीक मुहूर्त के लिए आप अपने शहर का आज का पंचांग देख सकते हैं।
रमा एकादशी क्या है?
रमा एकादशी व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह गुरुवार 5 नवंबर को पड़ रही है। यह दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा तथा आध्यात्मिक मुक्ति के लिए शुभ माना जाता है। साथ ही इस तिथि पर व्रत रखकर पूजा-पाठ करने से सफलता और समृद्धि मिलती है और पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का नाश होता है।
इसलिए रमा एकादशी तिथि पर भक्त व्रत रखते हैं, प्रार्थना करते हैं, जप और ध्यान करते हैं, सुबह जल्दी उठते हैं, रात्रि जागरण करते हैं, दान-पुण्य जैसे कार्य करते हैं और अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करते हैं, जिससे कि इस दिन का अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ उठाया जा सके।
रमा एकादशी का क्या महत्व है?
अब तक आप रमा एकादशी व्रत की तिथि, मुहूर्त और पारण आदि के समय से अवगत हो चुके होंगे। लेकिन जब तक आप रमा एकादशी व्रत के महत्व के बारे में नहीं जान लेते, तब तक आपकी जानकारी अधूरी है। आइए विस्तार से जानते हैं कार्तिक मास में पड़ने वाली इस एकादशी के महत्व के बारे में।
मां लक्ष्मी का आशीर्वाद
इस एकादशी का नाम रमा एकादशी होने के कारण आमतौर पर इसे राम से जोड़ा जाता है। लेकिन आपको बता दें कि रमा का अर्थ धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी से है। इसलिए इस एकादशी पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की संयुक्त पूजा का विधान है। सभी एकादशियों की तरह रमा एकादशी भी भगवान विष्णु को समर्पित है। लेकिन रमा एकादशी पर भक्त केवल श्रीहरि विष्णु ही नहीं बल्कि देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए भी व्रत रखते हैं और पूजा करते हैं। संक्षेप में कहें तो यह आध्यात्मिक मुक्ति, समृद्धि और लक्ष्मी नारायण का आशीर्वाद पाने की सबसे शक्तिशाली एकादशी है।
पाप कर्मों का नाश
मान्यता है कि रमा एकादशी पर किए गए व्रत-पूजन से पाप कर्मों का नाश होता है। इस एकादशी में इतनी शक्ति होती है कि जो व्यक्ति रमा एकादशी का व्रत रखता है, नियमों का पालन करता है वह स्वयं को पापों से मुक्त कर सकता है। यह दिन शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करता है।
दिवाली का प्रवेश द्वार
रमा एकादशी दिवाली के ठीक 4 दिन पहले आती है। इसलिए इसे दीपोत्सव और मां लक्ष्मी के आगमन का प्रवेश द्वार माना जाता है।
रमा एकादशी व्रत विधि
रमा एकादशी व्रत का अर्थ और महत्व समझने के बाद यह जानना भी जरूरी है कि इस दिन व्रत कैसे रखें या व्रत की विधि क्या है? नीचे दिए गए बिन्दुओं में व्रत नियमों के बारे में विस्तार से बताया गया है, जो रमा एकादशी व्रत में आपके बहुत काम आएगी।
दशमी तिथि की तैयारी (4 नवंबर 2026)
सूर्यास्त से पूर्व भोजन- एकादशी व्रत के नियम एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि से ही शुरू हो जाते हैं। इस दिन सुबह उठकर स्नान करें और पूजा के बाद ही भोजन ग्रहण करें। साथ ही इसका विशेष ध्यान रखें कि दशमी तिथि पर रात्रि का भोजन जल्दी कर लें। माना जाता है कि इससे पाचन तंत्र सही रहता है और शरीर एकादशी व्रत के लिए तैयार रहता है।
सात्विक भोजन- एकादशी व्रत के पहले दशमी तिथि के दिन मांसाहार का सेवन भूलकर भी न करें। साथ ही बिना लहसुन-प्याज वाला सात्विक भोजन ही खाएं।
एकादशी के दिन (5 नवंबर 2026)
निर्जला व्रत- रमा एकादशी पर यदि आपने निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया है तो व्रत के दौरान कुछ भी खाने-पीने से परहेज करें।
फलहारी व्रत- यदि आपने फलहारी व्रत रखने का संकल्प लिया है तो एकादशी के दिन पूजा के बाद आप फल या मेवे आदि खा सकते हैं।
सजला व्रत- अगर आप सजला व्रत या उपवास कर रहे हैं, तो एकादशी के दिन आप केवल तरल चीजें जैसे-नारियल पानी, जूस, दूध, छाछ या हर्बल चाय जैसे तरल पदार्थ का सेवन कर सकते हैं।
सात्विक व्रत- यदि आप रमा एकादशी पर सात्विक व्रत रखते हैं तो व्रत के दौरान आलू, शकरकंद, सिंघाड़े का आटा या कुट्टू के आटा का प्रयोग करते हुए सेंधा नमक मिलाकर सात्विक भोजन तैयार कर सकते हैं। सात्विक व्रत के दौरान ये चीजें मान्य होती हैं।
द्वादशी के दिन (6 नवंबर 2026)
जल्दी उठें- द्वादशी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठें और सबसे पहले स्नान कर साफ कपड़े पहन लें। व्रत खोलने से पहले सूर्य देव को जल से अर्घ्य दें, फिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करें।
पारण विधि- पूजा-पाठ और दान-दक्षिणा के बाद आप बताए गए मुहूर्त में पारण करके अपना व्रत खोल सकते हैं। एकादशी व्रत के पारण में हल्का भोजन करना चाहिए। साथ ही इस द्वादशी तिथि पर चावल खाना शुभ माना जाता है।
रमा एकादशी पूजा सामग्री
रमा एकादशी पर पूजा से पहले पूजा में प्रयोग होने वाली सामग्रियों को पहले से ही एक जगह पर इकट्ठा कर लें, जिससे कि पूजा के दौरान किसी तरह की परेशानी न हें। आपकी सुविधा के लिए यहां पूजा में प्रयोग होने वाली सामग्रियों के बारे में बताया गया है।
- भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र,
- तुलसी के पत्ते
- ताजे फूल
- मिट्टी का दीपक, घी, धूप, माचिस,
- पीला चंदन, मौली, सिंदूर, कुमकुम
- मौसमी फल (केला, सेब) और मिष्ठान
- कलश,पंचामृत, गंगाजल और शुद्ध जल
- रमा एकादशी व्रत कथा की पुस्तक
रमा एकादशी पूजा विधि
रमा एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का महत्व है। किसी कारण से नदी स्नान संभव न हो तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं। इसके बाद भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद लक्ष्मी नारायण की पूजा की तैयारी करें।
पूजा स्थल की तैयारी- जिस स्थान पर पूजा करनी है, उस स्थान को साफ और शुद्ध कर लें। गंगाजल छिड़के और फिर लकड़ी की चौकी स्थापित करें। चौकी के ऊपर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा या फोटो रखें। मूर्ति के दाईं ओर घी का दीपक जलाएं और जल से भरा एक कलश भी रखें। इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।
पूजा करें- मूर्ति की स्थापना करने के बाद अब पूजा का समय है। भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं और फिर गंगाजल छिड़कें। देवी लक्ष्मी को सिंदूर और कुमकुम लगाएं और भगवान विष्णु को चंदन का तिलक लगाएं। अब ताजे फूल अर्पित करें। वहीं देवी लक्ष्मी को लाल रंग के फूल चढ़ाएं।
भोग लगाएं- पूजा के लिए फल, मिष्ठान या जो भी भोग तैयार किए हों, उसे चढ़ाएं। श्रीहरि को प्रसाद में तुलसी के पत्ते अवश्य चढ़ाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि, प्रसाद पूरी तरह से सात्विक हो। मोटे अनाज, नमक और लहसुन-प्याज का उपयोग प्रसाद में न करें।
मंत्र जाप, व्रत कथा और आरती करें- पूजा विधि पूरी होने के बाद तुलसी की माला से भगवान विष्णु के मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें। रमा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें और आरती के साथ पूजा का समापन करें।
रमा एकादशी व्रत कथा
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें रमा एकादशी की व्रत कथा के बारे में बताते हैं। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा- हे प्रभु! कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसे करने के क्या फल मिलते हैं, सो आप विस्तारपूर्वक मुझे बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा- इस एकादशी का नाम रमा एकादशी है। इस व्रत को करने से बड़े-बड़े पाप कर्मों का नाश होता है। मैं तुम्हें इस व्रत का माहात्म्य बताया हूं, ध्यानपूर्वक सुनो।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीनकाल में मुचुकुंद नामक राजा था। वह बड़ा धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्यायप्रिय था। देवराज इंद्र के साथ उसकी अच्छी मित्रता थी। साथ यमराज, कुबेर, वरुण और विभीषण भी उसके मित्र थे। राजा की कन्या चंद्रभागा का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक बार शोभन अपने ससुराल आया हुआ था। उसी दौरान पुण्यदायिनी रमा एकादशी का व्रत भी आने वाला था। राजा ने ढोल बजवाकर पूरे राज्य में घोषणा करवा दी कि, एकादशी के दिन पूरे राज्य में भोजन नहीं पकना चाहिए।
व्रत का दिन नजदीक आ गया तब चंद्रभागा के मन में सोच उत्पन्न हुआ कि, मेरे पति अत्यंत दुर्बल हैं और एकादशी व्रत के नियम लेकर मेरे पिता की आज्ञा अति कठोर है। शोभन को भी चिंता होने लगी और उसने अपनी पत्नी से कहा- हे प्रिये! अब क्या करना चाहिए, मैं तो किसी भी तरह से भूख सहन नहीं कर पाऊंगा। इसलिए तुम कुछ ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरे प्राण बच सकें।
चंद्रभागा ने कहा- हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। यहां तक कि पशु-पक्षियों को भी अन्न नहीं दिया जाता है, फिर मनुष्य का क्या ही कहना। यदि आप भूख सहन नहीं कर सकते तो आप किसी दूसरे स्थान पर चले जाएं, क्योंकि यहां रहने पर आपको भी अवश्य व्रत करना ही पड़ेगा। यह सुनकर शोभन ने कहा- हे प्रिये! मैं अवश्य व्रत करूंगा, लेकिन तुम्हें छोड़कर दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा। अब जो भी भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा। इसके बाद शोभन ने भी रमा एकादशी व्रत रखने का विचार कर लिया, लेकिन व्रत के दौरान वह भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित होने लगा। दिनभर का समय किसी तरह बीत गया लेकिन रात्रि जागरण का समय शोभन के लिए अत्यंत दुखदायी हुआ और प्रात:काल होते ही द्वादशी तिथि पर उसके प्राण निकल गए। राजा मुचुकंद ने अपने दामाद का अंतिम संस्कार किया।
लेकिन चंद्रभागा सती नहीं हुई और शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद वह भगवान विष्णु की भक्ति करने लगी और पिता के घर ही रहने लगी। शोभन ने एकादशी का व्रत रखा था, इसलिए मृत्यु के बाद उसे रत्नों से जड़ित और शत्रुरहति एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। एक समय राजा मुचुकंद के नगर में रहने वाला ब्राह्मण सोमशर्मा तीर्थयात्रा पर निकला, तभी उसने वहां शोभन को देखा और पहचान लिया कि यह तो राजा का दामाद है। शोभन ने भी उन्हें पहचान लिया और अपने आसन से उठकर उसे प्रणाम किया और अपनी पत्नी के बारे में प्रश्न किया। ब्राह्मण ने कहा- हे राजन! आपकी पत्नी कुशल है और नगर में भी सब कुशल है। परंतु राजन, इतना सुंदर नगर आपको कैसे प्राप्त हुआ, इसके बारे में विस्तार से बताइए।
शोभन ने ब्राह्मण से कहा- कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत के पुण्यफल से मुझे यह सुंदर नगर प्राप्त हुआ है, लेकिन यह अस्थिर है और आप ही इसे स्थिर बना सकते हैं। ब्राह्मण ने कहा- यह अस्थिर कैसे है? शोभन ने कहा मैंने रमा एकादशी का व्रत तो किया, लेकिन श्रद्धापूर्वक नहीं बल्कि मजबूरी में किया, जिस कारण सब कुछ अस्थिर है। यदि आप यह सारी बात चंद्रभागा से कह देंगे तो यह स्थिर हो जाएगा। ब्राह्मण ने नगर वापस लौटकर चंद्रभागा को सारा वृत्तांत बताया। चंद्रभागा बहुत प्रसन्न हुई और उसे पति के दर्शन की तीव्र इच्छा भी हुई। चंद्रभागा ब्राह्मण से कहने लगी कि, मुझे वहां ले चलें, मैं अपने व्रत के पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।
ब्राह्मण चंदभागा को मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम ले गया। ऋषि ने वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक किया। मंत्र और एकादशी व्रत के प्रभाव से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया वह दिव्य गति को प्राप्त हुई। पत्नी को देख शोभन बहुत प्रसन्न हुआ। चंद्रभागा ने कहा- हे स्वामी, मैं अपने एकादशी व्रत का पुण्य आपको देती हूं। चंद्रभागा के यह कहते ही शोभन का राज्य स्थिर हो गया। चंद्रभागा और शोभन दोनों दिव्य आभूषणों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित होकर देवपुर में आनंदपूर्वक रहने लगे।
